Tuesday, 7 April 2015

करोड़ों फूंकने के बाद भी राज्य में नहीं खिले फूल


0 राष्ट्रीय बागवानी मिशन 2005 से कर रहा प्रोत्साहित
0 सरकार के पास मानीटरिंग की कोई व्यवस्था नहीं
रायपुर(जसेरि)। राष्ट्रीय बागवानी मिशन की उदासीनता और अधिकारियों की गलत नीतियों के कारण राज्य में जोरशोर से शुरू की गई विदेशी फूलों की खेती ने खिलने से पहले ही दम तोड़ दिया। वहीं छत्तीसगढ़ राज्य के विदेशी फूल निर्यात में शून्य भागीदारी है जबकि यहां पर फूलों के उत्पादन की पर्याप्त संभावना थी। वर्तमान में राजधानी के बाजार में विदेशी फूल को कौन कहे गेंदे तक में कलकत्ता के फूलों का कब्जा है। जबकि हार्टीकल्चर विभाग पिछले 8 सालों से राज्य को विदेशी फूलों के मामले में आत्म निर्भर बनाने के लिए करोड़ों का अनुदान बांट चुका है।
 सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार विभाग पिछले 2005-06 से राज्य में फूलों की खेती को बढावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रहा है उसके लिए बकायदा नि:शुल्क शेडनेट बांटे गए हैं तथा पालीनेट हाउस के लिए भी अनुदान दिए गए हैं ताकि राज्य के गर्म वातावरण में कृत्रिम तरीके से हाऊस के अंदर ठंडे प्रदेशों का वातावरण पैदा कर विदेशी फूलों की संरक्षित खेती की जाए और विदेश से आयात होने वाले फूलों को रोका जाए तथा फूलों के मामले में राज्य को आत्म निर्भर बनाया जाए। उल्लेखनीय है कि भारत में भी विभिन्न त्यौहारों में तथा स्वागत समारोहों में महंगे फूलों से स्वागत करने की परंपरा विकसित हुई है। हर राजधानी में फूलों की अलग मंडी विकसित हो चुकी है। इसके अलावा भारत विश्व बाजार में तेजी से फूल निर्यातक देश के रूप में भी उभर रहा है।
वर्तमान में सरीकल्चर विभाग द्वारा राज्य में डच रोजेज,मैनूपाल, सभी रंग के ग्लेिडियेटर, झरबेरा,कलकत्तिया गेंदा, रजनीगंधा तथा हाईब्रीड के फूलों की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा। फूलों की खेती के संबंध में जब जनता से रिश्ता ने बाजार सर्वे किया तो फूल चौक के शिव फूल भंडार के मोनू ने बताया कि अभी बाजार में कलकत्ता के गेंदा और विदेशी फूल ही आते हैं। वहीं एक अन्य व्यापारी का कहना था कि लोकल बाड़ी से डच गुलाब आए हैं बाकी मोंगरे की कलिया बिलासपुर से तथा सभी फूल अन्य प्रदेशों से आए हैं। छत्तीसगढ़ के फूल सिर्फ ठंड के मौसम में थोड़े बहुत आते हैैं।

मानीटरिंग को कोई व्यवस्था नहीं
सूत्रों का कहना है कि शासन किसानों को अनुदान देकर खुश है। विभाग किसानों को मुफ्त में शेडनेट बांटता है उसके बाद यह भी नहीं देखता कि उस शेडनेट में धनिया बोई जा रही है या फिर फूल खिलाए जा रहे हैं।

फूलों से डालर कमाने की नहीं मिली रही सुविधा
फूल कृषक श्री वरु ने बताया कि हमें कर्नाटक की तरह मार्केटिंग की सुविधा नहीं मिली जबकि कर्नाटक में किसानों को गुलाब को विदेश भेजने की सुविधा दी जा रही है। क्रिसमस में जब यूरोप में गुलाब फूलों की मांग होती है तब वहां बर्फ जमी रहती है। अगर हमें भी कर्नाटक के तरह ही विदेश व्यापार से जोड़ा जाता तो यहां भी फूलों की खेती परवान चढ़ सकती है।

फूलों का निर्यात करोड़ों में

भारत में वर्ष 2013-14 में फूलों का कुल निर्यात 455.90 करोड़ रुपए का रहा। प्रमुख आयातक देश संयुक्त राज्य अमेरिका, नीदरलैंड, जर्मनी, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, जापान और कनाडा थे। भारत में 300 से अधिक निर्यातोन्मुख इकाईयाँ है। फूलों की 50त्न से अधिक इकाईयाँ कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू में है। विदेशी कम्पनियों से तकनिकी सहयोग के साथ भारतीय पुष्पकृषि उद्योग विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की और अग्रसर है।

फूलों की खेती का रकबा बढ़ रहा
प्रदेश में फूलों की खेती का रकबा बढ़ रहा है। फूलों की खेती में अधिक पैसा लगता है। यहां के छोटे किसान उसे पूरा नहीं कर पाते हैं तथा अपने फूलों को विदेश नहीं भेज पाते हैं। इसके अलावा किसानों को खुद ही मार्केटिंग करना होता है जो उनके बस की बात नही है फिर भी हमारी कोशिश है कि राज्य में फूलों की खेती विकसित हो।
भुवनेश यादव
संचालक, उद्यानिकी विभाग

No comments:

Post a Comment