रायपुर। छत्तीसगढ़ शासन ने राष्ट्रीय हाथी परियोजना का नाम बदलकर गजराज परियोजना लागू की है। इस परियोजना में कोरबा जिले के लेमरू वन क्षेत्र को शामिल नहीं किया गया है जबकि पहले की हाथी परियोजना में लेमरू वन क्षेत्र शामिल था बल्कि लेमरू तथा बादलखोल के नाम से ही हाथी रिजर्व की अनुमति मिली थी।
जानकारों का कहना है कि लेमरू क्षेत्र में कोरबा जिले की बेशकीमती कोयला खदानें हैं इन खदानों के दोहन के लिए ही नई गजराज परियोजना लाकर पूरी चालाकी से इस क्षेत्र को उससे निकाल दिया गया है। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार पिछले दिनों एक बैठक में मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह ने 132 करोड़ की गजराज परियोजना को मंजूरी दी । इस बैठक में निर्णय लिया गया कि गजराज परियोजना कैम्पा योजना के तहत चलेगी तथा इसे 5 वर्ष में पूरा किया जाएगा। सरकारी तौर पर जारी समाचार में भी बताया गया है कि जंगली हाथियों की समस्या से प्रभावित राज्य के उत्तर पूर्वी सरगुजा और रायगढ़-जशपुर इलाके के सात वनमण्डलों में यह गजराज परियोजना लागू होगी। इनमें जशपुर, बलरामपुर, सरगुजा, सुरजपुर, धरमजयगढ़, रायगढ़ और कोरबा वन मण्डल शामिल हैं। लगभग 26 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रों में इस परियोजना का क्रियान्वयन कर वनों का विकास किया जाएगा। गजराज परियोजना के नाम से जरी इन नामों में कहीं भी लेमरु या बादलखोल का नाम तक उल्लेख नहीं किया गया है।
लेमरू क्षेत्र को गजराज परियोजना में शामिल किया गया है या नहीं पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक राम प्रकाश ने बताया कि यह परियोजना राज्य में निवासरत हाथियों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए लाई गई है। इसमें सेमरसोत, तमोर-पिंगला, बदलखोल तथा रायगढ व सरगुजा के इलाके शामिल हैं। उन्होंने कहा कि हम इस परियोजना के तहत हाथी कारीडोर बनाएँगे। लेकिन हाथी तो एक जानवर है उसे उसके मनपसंद रहवास देकर लुभाया जा सकता है लेकिन उसके लिए जगह आरक्षित कर उस क्षेत्र विशेष में निरूद्ध नहीं किया जा सकता है। श्री राम प्रकाश ने यह भी बताया कि महासमुंद जिले में भी गजराज परियोजना लागू नहीं की गई है जबकि इस वन क्षेत्र में भी हाथियों की उपस्थिति साल के अधिकांश महीनों में बनी रहती है।
क्या होगा गजराज परियोजना में
गजराज परियोजना के अंतर्गत हाथियों के ग्रामीण क्षेत्रों में आक्रमण से बचाव के लिए सोलर फेंसिंग किया जाएगा। वन क्षेत्रों के लगभग छह सौ गांवों के समीप हाथियों के प्रवेश को रोकने के लिए एक हजार किलोमीटर लम्बाई में सोलर फेंसिंग लगाए जाएंगे। वन क्षेत्रों में हाथियों के लिए रूचिकर भोजन वाले पेड़ पौधे जैसे बांस आदि लगाए जाएंगे। जंगलों में हाथियों के लिए तालाब और स्टॉप डेम भी बनाया जाएगा। उन्होंने ने बताया कि प्रकाश की मौजूदगी से हाथी दूर भागते हैं। इसलिए करीब छह सौ गांवों में सोलर मास्ट की व्यवस्था की जाएगी। लोगों को हाथियों से बचाव के लिए जागरूक किया जाएगा। हाथी मित्र दल गठित कर उनके माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जाएगा। हाथियों की समस्या से निपटने के लिए जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में जिला स्तरीय हाथी प्रबंधन समिति गठित की जाएगी।
पूर्व की हाथी परियोजना में शामिल था लेमरू
देश में मानव-हाथी सह-अस्तित्व को ध्यान में रखकर 1992 में केन्द्र प्रवर्तित हाथी परियोजना लागू की गई थी। इस परियोजना के अनुसार पूरे भारत में 25 हजार हाथी थे। इन हाथियों के लिए हाथी रिजर्व बनाए जाने थे।
सन 2005 तक विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा 26 हाथी रिजर्व (ईआर), 60,000 किमी से भी अधिक क्षेत्र तक विस्तारित करके आरंभिक रूप से अधिसूचित किए जा चुके थे। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 6 और हाथी रिजर्व के लिए सहमित दी गई जिसमें उड़ीसा में बैतरिणी हाथी रिजर्व तथा दक्षिण उड़ीसा ईआर, छत्तीसगढ़ में लेमडू(लेमरू) तथा बादलखोड़ (बादलखोल)और उत्तर प्रदेश में गंगा-यमुना (शिवालिक) हाथी रिजर्व, मेघालय में खासी ईआर. था । सभी संबंधित राज्य सरकारों द्वारा इन हाथी रिजर्व को अधिसूचित किया जाना था।
छत्तीसगढ़ में हाथियों का प्रजनन
सूत्रों के अऩुसार राज्य में वर्तमान में 250 हाथी निवास रत हैं और उनमें प्रजनन भी प्रारंभ हो गया है। जबकि प्रदेश के निर्माण के समय मात्र 33 हाथियों का आवास हुआ करता था। सूत्रों ने बताया कि ओडीशा और झारखंड से हाथियों का झुंड आने के कारण इनकी संख्या बढ़ी है। सूत्रों ने यह भी बताया कि हाथी जहां रहना पसंद करते हैं वहीं अपनी संतति उत्पन्न करते हैं अन्यथा उनमें प्रजनन नहीं होता है इसका विश्व स्तर पर उदाहरण युगांडा देश का है जहां हाथियों की उपस्थिति के बावजूद वंश वृद्धि नहीं हो रही है।
लेमरू क्षेत्र में कोयला खदान उत्खनन का प्रस्ताव नहीं
मुख्यमंत्री डा.रमन सिंह की अध्यक्षता में बनी 10 सदस्यीय स्टेट वाइल्ड बोर्ड की बिना अनुमति के किसी भी वन क्षेत्र में किसी भी तरह के उत्खनन का कार्य नहीं किया जा सकता है। दो महीने पहले हुई इस बैठक में लेमरू क्षेत्र में न कोई कोल माइंस के उत्खनन का प्रस्ताव आया है और न हीं लंबित है।
संदीप पौराणिक
सदस्य स्टेट वाइल्ड बोर्ड
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